April 2007


Gunghat Mein Tujhe Dekha To Deewanna Hua,
Sangeet Ka Taraana Hua,
Shamaa Ka Parwana Hua,
Masti Ka mastaana Hua,
Jaise Hi Gunghat Uthaya Is Duniya Se Ravana Hua

Pani pitaa hain pipe se
Apple khataan hain knife se
Uski bhi kya life hain yaaron
Jooten khataan hain wife se

Tere pyaar main deewana hua E chhaliye
Tere pyaar main deewana hua E chhaliye
…..
Iodex maliye kaam par chaliye

kabhi kehte the dost hamare ke
“jaan bhi maango to hazir hai”,
Aaj apni bivi ko jaan kehte hai ,
aur maango to inkaar karte hain

Wah re Deewane ,
Tujhe soojhi Hai Door Ki,
Soorat hai LANGOOR ki,
Aur Khwahish hai ANGOOR ki.

Bato se bhee ye gham kyon kam naheen hote
Aansuon se dil ke kone nam naheen hote

Thee bahut umeed to apnon se is dil ko kabhee
Par hameshaa saath ye hamdam naheen hote

Bebasee hansne lagee khaamoshi ab hai goonjtee
Band kamron men koyee mausam naheen hote

Jab khushee hai naachtee gaatee hai man kee har kalee
Un gharon men kyaa kabhee maatam naheen hote

Pyaar sab miltaa jinhen ranjish naheen koyee kabhee
Kyaa kabhee aise dilon men gham naheen hote

Yaad to karte hain unko ham sadaa hee raat din
Khwaab men unke kabhee kyaa ham naheen hote

EH kayanat mahkti hai teri khusboo se,
Dilon me jazba-e-barsat teri khusboo se !

Gulon me rang baharon me Jo angadaee hai,
Hawa ke sang mahkti hai teri khusboo se !

He aftab ki surkhi tere labon se hai,
Hai sitaron ki e barat teri khusboo se !

Shiyah rat ka wazood teri zulf ka kham,
Naseem-e-subha mahkti hai teri khusboo se

Tere kajal se churaya hai sham ne jadu,
Har sare sham mahkti hai teri khusboo se !

Tu mera dost hai sare jahan ko hai maloom,
Hai meri gazal ka doshi:z teri khusboo se ! !

log har mod pe ruk ruk ke sambhalate kyuu.nehin
itanaa darate hai.n to phir ghar se nikalate kyun nehin

main na juganu hoon diyaa hoon na koi tara hoon
raushani wale mere naam se jalate kyun hain.

neend se mera taalluq hii nahin barason se
Khuaab aa aa ke merii chhat pe Tahalate kyun nehin.

mood hota hai jawani ka sambhalane ke liye
aur sab log yahin aake phisalate kyun hai.n

Sms karti jaati hoon
koi jawaab nahi milta
phone karna chahti hoon
par man nahi maanta
agar un buzurg unglion
main taaqat hai baaki
to janab phone uthaiye
kya kabhi baat karne ka jee nahi karta??

बहार आई तो जैसे एक बार
लौट आए हैं फिर अदम से
वो ख्ह्वाब सारे, शबाब सारे
जो तेरे होंठों पे मर मिटे थे
जो मिट के हर बार फिर जिए थे
निखर गये हैं गुलाब सारे
जो तेरी यादों से मुश्कबू हैं
जो तेरे उश्शाक का लहू हैं

उबल पड़े हैं अज़ाब सारे
मलाल-ए-अहवाल-ए-दोस्तां भी
खुमार-ए-आगोश-ए-महवशां भी
गुबार-ए-खातिर के बाब सारे
तेरे हमारेसवाल सारे, जवाब सारे
बहार आई तो खुल गये हैं
नये सिरे से हिसाब सारे।

आईए हाथ उठायें हम भी
हम जिन्हें रस्म-ए-दुआ याद नहीं
हम जिन्हें सोज़-ए-मोहब्बत के सिवा
कोई बुत, कोई खुदा याद नहीं

आईए अर्ज़ गुज़रें कि निगार-ए-हस्ती
ज़हर-ए-इमरोज़ में शीरीनी-ए-फ़र्दां भर दे
वो जिन्हें तबे गरांबारी-ए-अय्याम नहीं
उनकी पलकों पे शब-ओ-रोज़ को हल्का कर दे

जिनकी आंखों को रुख-ए-सुबह का यारा भी नहीं
उनकी रातों में कोई शमा मुनव्वर कर दे
जिनके कदमों को किसी राह का सहारा भी नहीं
उनकी नज़रों पे कोई राह उजागर कर दे

जिनका दीन पैरवे-ए-कज़्बो-रिया है उनको
हिम्मत-ए-कुफ़्र मिले, जुर्रत-ए-तहकीक मिले
जिनके सर मुन्ताज़िर-ए-तेग-ए-जफ़ा हैं उनको
दस्त-ए-कातिल को झटक देने की तौफ़ीक मिले

इश्क का सर्र-ए-निहां जान-तपां है जिस से
आज इकरार करें और तपिश मिट जाये
हर्फ़-ए-हक दिल में खटकता है जो कांटे की तरह
आज इज़हार करें ओर खलिश मिट जाये ।

क्यूं मेरा दिल शाद नहीं है क्यूं खामोश रहा करता हूं
छो़डो मेरी राम कहानी मैं जैसा भी हूं अच्छा हूं

मेरा दिल गमग़ीं है तो क्या गमगीं ये दुनिया है सारी
ये दुख तेरा है न मेरा हम सब की जागीर है प्यारी

तू गर मेरी भी हो जाये दुनिया के गम यूं ही रहेंगे
पाप के फ़न्दे, ज़ुल्म के बन्धन अपने कहे से कट न सकेंगे

गम हर हालत में मोहलिक है अपना हो या और किसी का
रोना धोना, जी को जलाना यूं भी हमारा, यूं भी हमारा

क्यूं न जहां का गम अपना लें बाद में सब तदबीरें सोचें
बाद में सुख के सपने देखें सपनों की ताबीरें सोचें

बे-फ़िक्रे धन दौलत वाले ये आखिर क्यूं खुश रहते हैं
इनका सुख आपस में बाटें ये भी आखिर हम जैसे हैं

हम ने माना जंग कड़ी है सर फूटेंगे,खून बहेगा
खून में गम भी बह जायेंगे हम न रहें, गम भी न रहेगा

दोंनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शबे-ग़म गुज़ार के
वीरां है मैकदा ख़ुमो-साग़र उदास हैं
तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के
इक फुर्सते-गुनाह मिली, वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवरदिगार के
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझ से भी दिलफरेब हैं ग़म रोज़गार के
भूले से मुस्कुरा तो दिये थे वो आज फै़ज
मत पूछ वलवले दिले-नाकर्दाकार के
हम पर तुम्हारी चाह का इल्जा़म ही तो है
दुश्नाम तो नहीं है ये अक़ाम ही तो है
करते हैं जिसपे तअन कोई जुर्म तो नहीं
शौके-फिज़ूलो-उल्फ़ते-नाकाम ही तो है
दिल नाउमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

वो वक़्त मेरी जान बहुत दूर नहीं है

जब दर्द से रुक जायेंगी सब ज़ीस्त की राहें

और हद से गुज़र जायेगा अन्दोहे-निहानी

थक जायेंगी तरसी हुई नाकाम निगाहें

छिन जायेंगे मुझसे मेरे आंसू मेरी आहें

छिन जायेगी मुझसे मेरी बेकार जवानी

शायद मेरी उल्फ़त को बहुत याद करोगी

अपने दिले-मासूम को नाशाद करोगी

आओगी मेरी गोर पे तुम अश्क बहाने

नौखे़ज़ बहारों के हसीं फूल चढ़ाने

शायद मेरी तुरबत को भी ठुकरा के चलोगी

शायद मेरी बेसूद वफ़ाओं पे हंसोगी

इस वज़’ए-करम का तुम्हें पास न होगा

लेकिन दिले-नाकाम को एहसास न होगा

अलक़िस्सा माआले-ग़मे-उल्फ़त पे हंसो तुम

या अश्क बहाती रहो, फ़रियाद करो तुम

माज़ी पे नदामत हो तु्म्हें या कि मसर्रत

खा़मोश पड़ा सोएगा बामांदा-ए-उल्फ़त

फैज़

 
जीस्त-जीवन

अन्दोहे-निहानी-भीतरी दुख

नाशाद–कब्र

अश्क-आंसू

नौख़ेज़-नई

तुरबत-कब्र

वज़’ए-करम-करम का ढंग

अलकि़स्सा- संक्षेप

माआले-गमे-उल्फत-प्रेम के दुख के परिणाम से

माज़ी पे- अतीत पर

बामांदा-ए-उलफत- प्रेम के हाथों से श्रान्त

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